प्रत्यंचा

टोने, टोटके – अंधविश्वास या आस्था

भारत भूषण की रिपोर्ट

आषाढ़ के महीने में भी पानी को तरसती जमीन में पड़ती दरारों को देखकर चिंतित होते ग्रामीणों की पीड़ा और चिंता जायज़ है । हालांकि इंद्रदेव की बेरुखी की वजह जो भी हो लेकिन बारिश का अपना महत्व है, लिहाजा एक हद तक राहतों भरी बरसात का इंतज़ार करने के बाद ग्रामीण बारिश के लिए अपने पारंपरिक टोटकों का सहारा ले रहे हैं ।
बारिश के लिए टोने टोटके कोई नई बात नहीं है ये विद्याएं संभवतः कई प्रदेशों में आजमाई जाती हैं, बीते दिनों में मध्यप्रदेश के उज्जैन, देवास रायसेन और अन्य जगहों से ऐसे टोने टोटको की मसालेदार खबरें देखने पढ़ने सुनने को मिली हैं । बड़ी बात ये है कि ऐसी खबरों को अंधविश्वास बता कर खूब प्रचारित किया जाता है और विज्ञान के दार्शनिक तो इसे पाखंड भी कह डालते हैं । लेकिन एक तथ्य ऐसा भी है जो अभी तक अबूझ बना हुआ है। आप रायसेन उज्जैन या देवास के उदाहरणों को देखेंगे तो पाएंगे कि मेंढक मेंढकी का ब्याह रचाना, किसी जगह प्रधान को गधे पर उल्टा बैठाकर भ्रमण कराना या अन्य टोनों टोटकों को अमल में लाने के बाद वहां बरसात चालू हो गई ।
यदि ये क्रियाएं पाखंड हैं तो इनके सम्पन्न होते ही बरसात कैसे हुई? आखिर किसी मेंढक मेंढकी को राजा-रानी मानकर उनसे पानी मांगने पर बारिश होना, क्या सिद्ध करता है?
कुछ पढ़े लिखे लोगों के हिसाब से ये अंधविश्वास और आडम्बर हो सकते हैं लेकिन ग्रामीणों के लिए अल्पवर्षा काल मे ये टोटके अपना महत्व रखते हैं । ये टोने कैसे काम करते हैं या कितने शक्तिशाली होते हैं ये अलग विषय है, किन्तु ये भी सत्य है कि आपकी हमारी सोच में जो चीजें या क्रियाएं अंधविश्वास, आडंबर और पाखंड मानीं जातीं हैं वे ग्रामीण भारत मे विश्वास, रिवाज़ और प्रामाणिक सिद्ध होतीं हैं ।

pratyancha web desk

प्रत्यंचा दैनिक सांध्यकालीन समाचार पत्र हैं इसका प्रकाशन जबलपुर मध्य प्रदेश से होता हैं. समाचार पत्र 6 वर्षो से प्रकाशित हो रहा हैं , इसके कार्यकारी संपादक अमित द्विवेदी हैं .

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